पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'पश्चिम बंग' करने की तैयारी, विधानसभा में पेश होगा नया विधेयक
पश्चिम बंगाल राज्य का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर 'पश्चिम बंग' (Paschim Banga) किए जाने को लेकर राज्य सरकार ने विधानसभा में नया विधेयक पेश करने की घोषणा की है। प्रशासनिक बैठकों में नाम को लेकर होने वाली वर्णमाला संबंधी (Alphabetical) भ्रम और देरी को खत्म करने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'पश्चिम बंग' करने की तैयारी: प्रशासनिक भ्रम दूर करने विधानसभा में पेश होगा नया विधेयक
कोलकाता:
पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य का नाम आधिकारिक तौर पर बदलकर 'पश्चिम बंग' (Paschim Banga) या 'बंग' करने की दिशा में एक बार फिर बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। राज्य विधानसभा में भ्रम को खत्म करने और राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक प्रक्रियाओं में सहूलियत के लिए राज्य का नाम बदलने को लेकर एक नया विधेयक पेश करने की घोषणा की गई है।
नाम बदलने की मुख्य वजह और प्रशासनिक चुनौतियां
राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, अंग्रेजी में 'West Bengal' नाम होने के कारण राष्ट्रीय स्तर की अंतर-राज्यीय बैठकों, केंद्रीय सम्मेलनों और संसद/नीति आयोग की बैठकों में राज्य का नंबर सबसे अंत में आता है। वर्णमाला क्रम (Alphabetical Order) में 'W' अक्षर सबसे नीचे होने के कारण राज्य के प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है और कई बार समय की कमी के कारण उन्हें पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।
नाम बदलकर 'पश्चिम बंग' या 'बंगला' किए जाने से यह वर्णमाला तालिका में काफी ऊपर आ जाएगा, जिससे प्रशासनिक बैठकों में राज्य का प्रतिनिधित्व और संवाद प्रक्रिया बेहतर हो सकेगी।
ऐतिहासिक और भाषाई पृष्ठभूमि
1947 में भारत के विभाजन के समय बंगाल प्रांत को दो हिस्सों में बांटा गया था— पूर्वी बंगाल (जो बाद में पूर्वी पाकिस्तान और फिर 1971 में बांग्लादेश बना) और पश्चिम बंगाल। राज्य के बुद्धिजीवियों और भाषाविदों का मानना है कि विभाजन के कई दशकों बाद भी 'पश्चिम' (West) शब्द का इस्तेमाल औपनिवेशिक और विभाजनकालीन मानसिकता का प्रतीक लगता है, जबकि अब कोई 'पूर्वी बंगाल' भारत का हिस्सा नहीं है। ऐसे में बांग्ला भाषा और संस्कृति के अनुरूप राज्य का नाम 'पश्चिम बंग' या 'बंग' रखा जाना तर्कसंगत है।
संसदीय प्रक्रिया और केंद्र की स्वीकृति
विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी और संवैधानिक संशोधन के लिए केंद्र सरकार तथा संसद के पास भेजा जाएगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी भी राज्य के नाम, सीमा या क्षेत्र में परिवर्तन करने का अंतिम अधिकार भारत की संसद के पास होता है।
राज्य सरकार को उम्मीद है कि इस बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से जल्द से जल्द मंजूरी हासिल कर ली जाएगी, ताकि दशकों पुराना नाम बदलने का मुद्दा हल हो सके।




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